अनुप्रास अलंकार: परिभाषा, प्रकार और उदाहरण | पूर्ण मार्गदर्शिका
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अनुप्रास अलंकार क्या है?
- अनुप्रास अलंकार हिंदी साहित्य का एक प्रमुख शब्दालंकार है, जिसमें एक ही वर्ण या वर्ण समूह की आवृत्ति से काव्य में लय और मधुरता उत्पन्न होती है।
- यह काव्य को संगीतमय और प्रभावशाली बनाता है।
परिभाषा
“जहाँ एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।”
अनुप्रास अलंकार के प्रकार
- यह 6 प्रकार का होता है
- छेकानुप्रास अलंकार
- वृत्यानुप्रास अलंकार
- लाटानुप्रास अलंकार
- अन्त्यानुप्रास अलंकार
- श्रुत्यानुप्रास अलंकार
छेकानुप्रास
- जब स्वरूप और उच्चारण में समान वर्णों की पुनरावृत्ति हो।
उदाहरण:
“तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”
वृत्यानुप्रास
“जब समान वर्णों का प्रयोग विशेष रीति से किया जाए।”
उदाहरण:
“मुदित महीपति मंदिर आए।”
लाटानुप्रास
“जब एक ही शब्द की बार-बार आवृत्ति हो।”
उदाहरण:
“जय जय जय जय जय जय जय हे।”
श्रुत्यानुप्रास
जब समान ध्वनि वाले भिन्न वर्णों का प्रयोग हो।
उदाहरण:
“घन घोर घटा घमंड घेरे।”
अनुप्रास अलंकार के उदाहरण
मुदित महीपति मंदिर आए
सेवक सचिव सुमंत बुलाए
प्रकृति वर्णन:
“चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।”
भक्ति रस:
“मधुर मधुर मधुर मुख बोली, मधुर मधुर मधुर मुस्कान।”
श्रृंगार रस:
“ललित लवंग लता पर, लिपटे लटके लोल।”
अनुप्रास अलंकार का महत्व
- काव्य को सुरीला और आकर्षक बनाता है
- यह भाषा में लय और संगीतमयता उत्पन्न करता है
- काव्य के भावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है
- स्मरणीयता को बढ़ाता है
| विशेषता | अनुप्रास अलंकार | यमक अलंकार |
|---|---|---|
| प्रकृति | वर्णों की पुनरावृत्ति | शब्दों की पुनरावृत्ति |
| उद्देश्य | ध्वनि सौंदर्य | अर्थ विस्तार |
| उदाहरण | “तरनि तनूजा तट तमाल” | “काल करे सो आज कर” |
निष्कर्ष
- अनुप्रास अलंकार हिंदी काव्य का एक मूलभूत और सुंदर अलंकार है जो कविता को संगीतमय बनाकर पाठक के मन पर अमिट छाप छोड़ता है।
- यह कवियों द्वारा सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला अलंकार है जो काव्य को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
