Doha Chhand | दोहा छंद क्या है? परिभाषा, लक्षण और 10 उदाहरण सहित व्याख्या

दोहा छंद(Doha Chhand)

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दोहा छंद क्या है? | Doha Chhand kya hai

  • दोहा हिंदी काव्य का एक अत्यंत लोकप्रिय मात्रिक छंद है जिसका प्रयोग नीति, भक्ति और ज्ञान के वचनों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
  • यह अर्धसम मात्रिक  छंद की श्रेणी में आता है।

दोहा छंद की परिभाषा | Doha Chhand ki Pribhasha

“दोहा एक मात्रिक छंद है जिसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरणों के अंत में **गुरु-लघु (ऽ।)** का प्रयोग होता है।”


दोहा छंद की विशेषताएँ:

मात्रा विन्यास:⇒ 3, 11, 13, 11 (कुल 48 मात्राएँ)

अंत यति:⇒ विषम चरणों में गुरु-लघु (ऽ।)

भाषा:⇒ सरल और प्रभावी

प्रयोग:⇒ नीति, उपदेश, भक्ति भावना

लोकप्रियता:⇒ कबीर, रहीम, तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त


दोहा छंद का मात्रा विन्यास  | Doha-Chand ka Matra Vinyas

पहला चरण:⇒ 13 मात्राएँ (ऽ। अंत में)

दूसरा चरण:⇒ 11 मात्राएँ (।ऽ अंत में)

तीसरा चरण:⇒ 13 मात्राएँ (ऽ। अंत में)

चौथा चरण:⇒ 11 मात्राएँ (।ऽ अंत में)


दोहा छंद के उदाहरण (Doha  Chhand ke Udaharan)

कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।

मात्रा गणना:

बड़ा भया तो क्या भया (13) , जैसे पेड़ खजूर (11)

पंथी को छाया नहीं (13) , फल लागैं अति दूर (11)

व्याख्या:

कबीरदास जी कहते हैं कि ऐसे बड़े होने का कोई फायदा नहीं है, जैसे खजूर का पेड़ होता है। वह इतना बड़ा और ऊँचा होता है कि न तो राहगीर (पंथी) को छाँह दे पाता है और उसके फल भी बहुत ऊँचाई पर लगते हैं। अर्थात, यदि आप किसी के काम नहीं आ सकते, तो आपका बड़प्पन व्यर्थ है।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

मात्रा गणना:

बुरा जो देखन मैं चला (13) , बुरा न मिलिया कोय (11)

जो दिल खोजा आपना (13) , मुझसे बुरा न कोय (11)

व्याख्या: जब मैं संसार में दूसरों में कमियाँ और बुराइयाँ ढूँढने निकला, तो मुझे कोई भी बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने शांत होकर अपने अंदर झाँका और अपने मन को टटोला, तो पाया कि मुझसे बुरा और कमियों से भरा इंसान कोई दूसरा है ही नहीं।

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

मात्रा गणना:

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ (13) | पंडित भया न कोय (11)

ढाई आखर प्रेम का (13) | पढ़े सो पंडित होय (11)

व्याख्या: बड़ी-बड़ी पुस्तकें और शास्त्र पढ़-पढ़कर न जाने कितने लोग इस संसार से चले गए, लेकिन कोई सच्चा ज्ञानी या पंडित नहीं बन सका। वास्तव में जो इंसान प्रेम और मानवता के केवल ढाई अक्षर को अच्छी तरह समझ लेता है और उसे अपने जीवन में उतार लेता है, वही सच्चा ज्ञानी है।


रहीम के दोहे:

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरौ चटकाय।

टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।

मात्रा गणना:

रहिमन धागा प्रेम का (13) | मत तोरौ चटकाय (11)

टूटे से फिर ना मिले (13) | मिले गाँठ परि जाय (11)

व्याख्या: रहीम जी कहते हैं कि प्रेम का रिश्ता एक नाजुक धागे की तरह होता है, इसे किसी झटके या गुस्से में आकर तोड़ना नहीं चाहिए। यदि यह प्रेम रूपी धागा एक बार टूट जाता है, तो फिर पहले की तरह जुड़ता नहीं है, और अगर इसे जबरदस्ती जोड़ भी दिया जाए, तो मन में एक दरार (गाँठ) हमेशा के लिए रह जाती है।

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ मांगन जाहिं।

उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।

मात्रा गणना:

रहिमन वे नर मर चुके (13) | जे कहुँ मांगन जाहिं (11)

उनते पहले वे मुए (13) | जिन मुख निकसत नाहिं (11)

व्याख्या: रहीम जी के अनुसार, वे मनुष्य मरे हुए के समान हैं जो अपनी जीविका या स्वार्थ के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने (माँगने) जाते हैं। परंतु, उनसे पहले वे लोग मरे हुए के समान हैं, जो सक्षम होने के बावजूद याचक को देखकर साफ मना (नाहिं) कर देते हैं और उनकी मदद नहीं करते।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।

चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।

मात्रा गणना:

जो रहीम उत्तम प्रकृति (13) | का करि सकत कुसंग (11)

चन्दन विष व्यापत नहीं (13) | लपटे रहत भुजंग (11)

व्याख्या: जो व्यक्ति उत्तम और दृढ़ स्वभाव का होता है, बुरी संगति (कुसंग) उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ठीक वैसे ही, जैसे चंदन के पेड़ पर चौबीसों घंटे जहरीले सांप (भुजंग) लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन अपनी शीतलता और खुशबू नहीं छोड़ता और उसमें सांपों का जहर नहीं फैलता।


तुलसीदास के दोहे: | Tulsidas dohe

तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर,

बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर

मात्रा गणना:

तुलसी मीठे बचन ते (13), सुख उपजत चहुँ ओर (11)

बसीकरन इक मंत्र है (13),  परिहरू बचन कठोर (11)

व्याख्या: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठी वाणी और मधुर वचन बोलने से चारों तरफ सुख और सकारात्मकता का माहौल बनता है। मीठे बोल किसी को भी अपना बना लेने (वशीकरण) का सबसे अचूक मंत्र हैं, इसलिए इंसान को कड़वे और कठोर वचन बोलने की आदत छोड़ देनी चाहिए।

आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह,

तुलसी तहां न जाइये, कंचन बरसे मेह

मात्रा गणना:

आवत ही हरषै नहीं (13) | नैनन नहीं सनेह (11)

तुलसी तहां न जाइये (13) | कंचन बरसे मेह (11)

व्याख्या: जिस घर या स्थान पर आपके जाने से लोगों के मन में हर्ष (ख़ुशी) न हो और उनकी आँखों में आपके प्रति स्नेह (प्रेम) न दिखाई दे, वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए—चाहे वहाँ सोने (कंचन) की वर्षा ही क्यों न हो रही हो। स्वाभिमान सबसे ऊपर है।

बिहारीलाल के दोहे

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सब बात।

मात्रा गणना:

कहत नटत रीझत खिझत (13) | मिलत खिलत लजियात (11)

भरे भौन में करत हैं (13) | नैननु ही सब बात (11)

व्याख्या: बिहारी जी ने इस दोहे में गागर में सागर भरा है। वे कहते हैं कि लोगों से भरे हुए एक भवन (भौन) में नायक और नायिका किसी को पता चले बिना सिर्फ अपनी आँखों के इशारों से पूरी बात कर लेते हैं। नायक कुछ कहता है, नायिका मना करती है (नटत), नायक उसकी इस अदा पर रीझ जाता है, नायिका बनावटी गुस्सा (खिझत) दिखाती है, फिर दोनों की आँखें मिलती हैं, चेहरे खिल उठते हैं और नायिका शर्मा (लजियात) जाती है।

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।

उहि खाये बौरात जग, इहि पाये बौराय।

मात्रा गणना:

कनक कनक ते सौ गुनी (13) | मादकता अधिकाय (11)

उहि खाये बौरात जग (13) | इहि पाये बौराय (11)

व्याख्या: यहाँ ‘कनक’ शब्द के दो अर्थ हैं—धतूरा (एक नशीला फल) और सोना (धन-दौलत)। बिहारी जी कहते हैं कि सोने में धतूरे से भी सौ गुना ज्यादा नशा होता है। धतूरे को तो लोग खाकर पागल (बौरात) होते हैं, लेकिन सोने (धन) को तो लोग सिर्फ पाकर ही होश खो बैठते हैं और अहंकार से पागल हो जाते हैं।

मात्रा गणना का (Quick Rule):

लघु मात्रा (): अ, इ, उ, ऋ और चन्द्रबिन्दु (ँ) वाले अक्षरों को 1 मात्रा गिना जाता है।

गुरु मात्रा (): आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं (अनुस्वार) और विसर्ग (ः) वाले अक्षरों को 2 मात्राएँ गिना जाता है।

दोहा छंद के अन्य उदाहरण | Doha Chhand ke Udaharan

उदाहरण 1

ऊँच-नीच की छोड़िए, मन में रखिए प्यार।
सबसे मिलकर रहिए, सुखी रहे संसार।।

अर्थ:-

  • जात-पात और भेदभाव को छोड़कर मन में प्रेम रखना चाहिए। मिल-जुलकर रहने से ही यह दुनिया सुखी हो सकती है।

उदाहरण 2

बीता वक्त न लौटता, लाख करो तुम जतन।

आज सँवारो प्रेम से, यही श्रेष्ठ है धन।।

अर्थ:-

  • आप कितनी भी कोशिश कर लें, बीता हुआ समय वापस नहीं आता। इसलिए वर्तमान को मेहनत और प्रेम से जीना ही सबसे बड़ी संपत्ति है।

उदाहरण 3

धीरज रखिए मन सदा, फल पावेगा नेक।

बाधाएँ आती यहाँ, रस्ते सौ पर एक।।

अर्थ:-

मन में हमेशा धैर्य रखें, उसका फल अच्छा ही मिलेगा। सफलता की राह में बाधाएँ बहुत आती हैं, लेकिन दृढ़ निश्चय से रास्ता निकल आता है।

दोहा छंद vs सोरठा छंद

विशेषतादोहासोरठा
मात्रा विन्यास13+11+13+1111+13+11+13
अंत यतिविषम चरण: गुरु-लघुविषम चरण: लघु-गुरु
प्रयोगनीति/भक्ति वचनव्यंग्य/नीति कथन

दोहा छंद का महत्व

  • यह हिंदी साहित्य का सर्वाधिक लोकप्रिय छंद
  • यह ज्ञान और नीति का सरल माध्यम है
  • यह सहजता से याद होने वाला छंद है
  • यह लोक साहित्य में व्यापक प्रयोग किया गया है
  • यह प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाला महत्वपूर्ण टॉपिक

निष्कर्ष

  • दोहा छंद हिंदी काव्य की एक अनूठी विधा है जो कम शब्दों में गहन अर्थ व्यक्त करती है।
  • कबीर, रहीम जैसे संत कवियों ने इस छंद का उपयोग कर जन-जन तक ज्ञान का प्रसार किया।
  • आज भी यह छंद अपनी सरलता और प्रभावशीलता के कारण लोकप्रिय है।

NCERT

सोरठा छंद 

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