चोल वंश: दक्षिण भारत का स्वर्णिम साम्राज्य जिसने समुद्र पार किया
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- चोल वंश प्राचीन भारत का एक ऐसा साम्राज्य था जिसने न केवल दक्षिण भारत बल्कि समुद्र पार के देशों पर भी अपनी शक्ति का परचम लहराया।
- इस वंश का उदय 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक रहा और इसने दक्षिण भारत में एक अद्वितीय राजनीतिक, सांस्कृतिक और कलात्मक विकास को जन्म दिया।
- चोल शासकों ने एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया, एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की और वास्तुकला के ऐसे अद्भुत नमूने छोड़े जो आज भी UNESCO की विश्व धरोहर स्थल हैं।
- तंजावुर (तंजौर) में बृहदेश्वर मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है।
- यह लेख प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए चोल वंश का एक व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
चोल वंश का उदय और प्रमुख शासक
- चोल वंश का प्रारंभिक उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है, लेकिन 9वीं शताब्दी में विजयालय चोल ने तंजावुर को जीतकर चोल साम्राज्य की नींव रखी।
1. विजयालय चोल (850 ई.):
- इन्हें मध्यकालीन चोल वंश का संस्थापक माना जाता है।
- उन्होंने तंजावुर पर अधिकार कर चोल पुनरुत्थान की शुरुआत की।
2. आदित्य चोल I (871-907 ई.):
- इन्होंने पल्लव वंश को पराजित कर चोल साम्राज्य का विस्तार किया।
3. परांतक चोल I (907-955 ई.):
- इन्होंने पांड्य और सीलोन (श्रीलंका) के विरुद्ध सफल अभियान चलाए, लेकिन बाद में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय से हार का सामना करना पड़ा।
4. राजराजा चोल I (985-1014 ई.):
- यह चोल वंश के सबसे महान शासकों में से एक थे। उन्होंने चोल साम्राज्य को एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया।
प्रमुख उपलब्धियाँ
- केरल, पांड्य और चेर राज्यों पर विजय।
- सीलोन (श्रीलंका) के उत्तरी भाग पर अधिकार।
- लक्षद्वीप और मालदीव द्वीप समूहों पर विजय।
- कलिंग (उड़ीसा) पर आक्रमण।
- तंजावुर में ‘राजराजेश्वरम मंदिर’ (बृहदेश्वर मंदिर) का निर्माण करवाया, जो द्रविड़ वास्तुकला का शिखर है।
5. राजेंद्र चोल I (1014-1044 ई.):
- राजराजा के पुत्र राजेंद्र चोल ने साम्राज्य विस्तार को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
- उत्तर भारत में गंगा घाटी तक विजय अभियान चलाया और ‘गंगईकोंड चोलपुरम’ (चोलों का गंगा को जीतने वाला शहर) नामक नई राजधानी बसाई।
- श्रीविजय साम्राज्य (दक्षिण-पूर्व एशिया) के राजा पर विजय प्राप्त की। यह एक नौसैनिक विजय थी जो भारतीय नौसेना की शक्ति का प्रतीक है।
- गंगईकोंड चोलपुरम में एक और भव्य बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
