अन्योक्ति अलंकार: परिभाषा, प्रकार और उदाहरण
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अन्योक्ति अलंकार क्या है?
- अन्योक्ति अलंकार हिंदी काव्य का एक अर्थालंकार है, जिसमें किसी वस्तु, प्राणी या प्राकृतिक घटना के माध्यम से मनुष्य को संदेश दिया जाता है।
- यह एक प्रकार का प्रतीकात्मक या व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम है, जिसमें सीधे कहने के बजाय इशारों में बात कही जाती है।
परिभाषा:
“जहाँ किसी निर्जीव वस्तु, पशु-पक्षी या प्रकृति के माध्यम से मनुष्य को कोई संदेश, शिक्षा या व्यंग्य किया जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।”
अन्योक्ति अलंकार के प्रकार
- प्रतीकात्मक अन्योक्ति अलंकार
- व्यंग्यात्मक अन्योक्ति अलंकार
1. प्रतीकात्मक अन्योक्ति अलंकार
- जहाँ प्रकृति या वस्तुओं के माध्यम से गहरा संदेश दिया जाता है।
उदाहरण:
“कोयल काको संदेशा, कहि जात कुहुक-कुहुक”
(यहाँ कोयल के माध्यम से प्रेमी-प्रेमिका का संदेश दिया गया है।)
2. व्यंग्यात्मक अन्योक्ति अलंकार
- जहाँ किसी वस्तु या जीव के माध्यम से मनुष्य की कमियों पर व्यंग्य किया जाता है।
उदाहरण:
“कागा काको धन हरै, कोयल काको देत।
मधुर वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेत।”
(यहाँ कौए और कोयल के माध्यम से लोगों के स्वभाव पर व्यंग्य किया गया है।)
अन्योक्ति अलंकार के 10+ उदाहरण सहित व्याख्या
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहि काल।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल॥
व्याख्या: यहाँ अप्रस्तुत रूप में भौंरे (अली) और कली का वर्णन है, लेकिन इसके माध्यम से प्रस्तुत रूप में राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। राजा अपनी नई-नवेली रानी के प्रेम में डूबकर राज-काज भूल गए थे। कवि कहते हैं कि अभी तो न इस कली में पराग है, न मीठी मकरंद और न ही इसका पूरा विकास हुआ है। यदि भौंरा अभी से इसके वश में हो गया है, तो आगे इसका क्या हाल होगा?
माली आवत देखकर, कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुनि लए, कालि हमारी बार॥
व्याख्या: यहाँ माली, फूल और कलियों के माध्यम से जीवन के कड़वे सच को दिखाया गया है। माली (काल/यमराज) को आते देखकर कलियाँ (युवा/बालक) आपस में कहती हैं कि आज उसने खिले हुए फूलों (बूढ़ों) को तोड़ लिया है, और कल हमारी बारी आएगी। यहाँ संसार की नश्वरता पर चोट की गई है।
रे रे चातक सावधान मन सों, मित्र छन कुँवर दे।
अंबुद बहुत से हैं इस गगन में, सभी नहीं हैं ऐसे॥
कुछ तो वृष्टि से भिगोते हैं वसुधा को, कुछ गरजते हैं वैसे।
जिस-जिस को देखते हो, उस-उस के सामने हाथ मत फैलाओ॥
व्याख्या: यहाँ चातक पक्षी (जो सिर्फ स्वाति नक्षत्र की बूँद पीता है) के माध्यम से एक स्वाभिमानी इंसान को सीख दी गई है। कवि कहते हैं कि आसमान में बहुत सारे बादल (धनी लोग) हैं, लेकिन सब दयालु नहीं होते। कुछ तो धरती को तृप्त करते हैं और कुछ सिर्फ खोखला गरजते हैं। इसलिए हर किसी के सामने अपनी याचना या हाथ मत फैलाओ।
इन्हें न विरद बसाइये, देखि गुलाब की डार।
अब अली रही गुलाब में, अपत कँटीली डार॥
व्याख्या: यहाँ गुलाब के पौधे और भौंरे के माध्यम से उस राजा या आश्रयदाता का वर्णन है जिसका वैभव अब समाप्त हो चुका है। कवि कहते हैं कि अब इस गुलाब के पौधे पर न तो वो महक है और न फूल, अब तो सिर्फ कँटीली डालियाँ बची हैं। इसके जरिए बताया गया है कि बुरे दिन आने पर पुराने साथी भी साथ छोड़ देते हैं।
सुनकर गुन की गाहकी, लहै न कोऊ लखाय।
ज्यों कर कंचन बेचिए, त्यों लोहार के जाय॥
व्याख्या: यहाँ सोने (कंचन) को लोहार की दुकान पर ले जाकर बेचने की बात कही गई है। अप्रस्तुत रूप में इसका अर्थ है कि मूर्खों या कद्र न करने वालों के बीच अपने ज्ञान और गुणों का बखान करना व्यर्थ है। जहाँ आपके गुणों की परख न हो, वहाँ चुप रहना ही बेहतर है।
जिन दिन देखे वे मुकुट, वे सुवास वे रंग।
अब अली रही गुलाब में, केवल कँटीली संग॥
व्याख्या: यह भी गुलाब के माध्यम से जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। जब तक सुख के दिन थे, तब तक भौंरे आस-पास मंडराते थे। लेकिन जब सुख चला गया (पतझड़ आया), तो केवल काँटे ही साथ रह गए। यह स्वार्थी मित्रों पर एक अन्योक्ति है।
कूप खनत कूपन परै, थाह न पावै कोय।
ज्यों-ज्यों गहरे बैठिए, त्यों-त्यों मीठो होय॥
व्याख्या: यहाँ कुएँ के पानी की गहराई के माध्यम से ज्ञान की गहराई की बात की गई है। सतही तौर पर देखने वालों को ज्ञान का आनंद नहीं मिलता, जो इंसान जितना गहरे डूबकर अध्ययन या साधना करता है, उसे उतना ही आनंद और मीठा फल प्राप्त होता है।
सिंह सुता जेहि ले गई, सियार चबावै हाड।
यह प्रताप उस भूप का, जो न तजै निज पाड॥
व्याख्या: यहाँ शेर और सियार के माध्यम से कायर और वीर राजाओं की तुलना की गई है। यदि कोई बलवान राजा (सिंह) अपनी मर्यादा छोड़ देता है, तो छोटे और तुच्छ शत्रु (सियार) भी उसका फायदा उठाने लगते हैं।
नीर-क्षीर विवेचन में, हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत।
विश्वस्मिन्नधुनान्यो कुलव्रतं पालयिष्यति कः॥
व्याख्या: हंस के पास यह गुण होता है कि वह दूध और पानी को अलग-अलग (नीर-क्षीर विवेक) कर देता है। कवि हंस के माध्यम से समाज के बुद्धिजीवियों और न्यायधीशों से कहते हैं कि हे हंस! यदि तुम ही अपना कर्तव्य निभाने में आलस्य करोगे, तो इस संसार में सत्य और असत्य का फैसला कौन करेगा?
स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा देखि विहंग बिचारि।
बाज पराये पानि परि तू पँछिनु न मारि॥
व्याख्या: राजा जयसिंह जब औरंगज़ेब के इशारे पर अपने ही भाई-बंधुओं (हिंदू राजाओं) पर आक्रमण कर रहे थे, तब बिहारी ने यह दोहा लिखा था। उन्होंने बाज पक्षी से कहा कि हे बाज! तू शिकारी के हाथों की कठपुतली बनकर अपनी ही जाति के छोटे पक्षियों का शिकार मत कर। इसमें न तो तेरा कोई स्वार्थ पूरा हो रहा है, न तुझे पुण्य मिलेगा और तेरा श्रम भी व्यर्थ जा रहा है।
“बैठि रहीम संगत सुभ, कीरति बिगारि आप।
ज्यों कंचन संग सुवर्ण, गावति लोहु कलाप।।”
(सोने के संग रहने से लोहे का रंग भी बदल जाता है।)
“जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाँड़ति छोह।।“
(मछली पानी के मोह में फंस जाती है।)
“कहि रहीम कैसे निभै, बिन साबण पानी।
बिनु हरि संग जगत के, यहै अकथ कहानी।।”
(बिना साबुन के पानी से कपड़ा नहीं धुलता, ठीक वैसे ही बिना ईश्वर के जीवन नहीं चलता।)
“धरती की रीत यही, ज्यों आवै त्यों जाय।
पर्वत ऊँचे होत हैं, बहत नदिया नाय।।”
(धरती का नियम यही है कि जो आता है, वह जाता है।)
“तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सच्ची दान।।”
(पेड़ अपने फल नहीं खाते, सरोवर अपना पानी नहीं पीते।)
अन्योक्ति अलंकार का महत्व
प्रतीकात्मक भाषा का सुंदर उपयोग
व्यंग्य और शिक्षा देने का सशक्त माध्यम
काव्य को गहरा और प्रभावशाली बनाता है
मनुष्य के स्वभाव और समाज पर टिप्पणी करता है
| विशेषता | अन्योक्ति | उपमा |
|---|---|---|
| प्रकृति | प्रतीकात्मक संदेश | सीधी समानता |
| उद्देश्य | शिक्षा या व्यंग्य | सौंदर्य वर्णन |
| उदाहरण | कागा काको धन हरै | मुख चंद्रमा-सा सुंदर |
अन्योक्ति अलंकार को याद रखने का सूत्र:
जहाँ सीधे-सीधे (Direct) बात न बोलकर, किसी पशु, पक्षी, प्रकृति या वस्तु का सहारा लेकर किसी इंसान को ताना मारा जाए या सीख दी जाए, वहाँ हमेशा अन्योक्ति अलंकार होता है। इसे ‘अप्रस्तुत प्रशंसा’ भी कहा जाता है।
निष्कर्ष
- अन्योक्ति अलंकार हिंदी काव्य का एक गहन और प्रभावशाली अलंकार है, जो प्रतीकों और व्यंग्य के माध्यम से मनुष्य को जीवन की सीख देता है।
- यह कवियों द्वारा समाज और मानवीय स्वभाव पर टिप्पणी करने का सशक्त माध्यम है।
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